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गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर-


गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर-
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भारतीय संविधान निर्माता भारत रत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर

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26 जनवरी गणतंत्र दिवस और बाबा साहब संविधान लागू होना और मनुवादी मानसिकता
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26 जनवरी को गणतंत्र दिवस है, इस दिन संविधान की चर्चा होनी चाहिए, साथ ही संविधान निर्माता को याद करना चाहिए, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता है।

जिस प्रकार 15 अगस्त को हम लोग स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, उस दिन स्वतंत्रता के इतिहास पर चर्चा की जाती है, साथ ही स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को याद किया जाता है। उसी तरह 26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर भारत के संविधान पर चर्चा होनी चाहिए एवं साथ ही संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर को याद करना चाहिए। लेकिन हमारे देश में गणतंत्र दिवस के मौके पर न तो संविधान की चर्चा होती है और न संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर को याद किया जाता है।
इसके पीछे जरूर कुछ कारण हैं, उन पर प्रकाश डालना बहुत जरूरी है।

सबसे पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि बाबा साहेब आंबेडकर की जयंती पर बड़े बड़े भाषण देने वाले इन मनुवादियों को बाबा साहेब आंबेडकर बिलकुल पसंद नहीं थे। बल्कि वे इनकी आंखों में खटकते थे, तभी तो 1946 में हुए संविधान सभा के चुनाव में बाबा साहेब आंबेडकर को विजयी नहीं होने दिया गया। लेकिन उस वक्त शोषित समाज के बहुत बड़े नेता जोगिंदर नाथ मंडल ने बाबा साहेब आंबेडकर को बंगाल से चुनाव जीताकर संविधान सभा में भेजने का काम किया, तो वह भी मनुवादियों को रास नहीं आया और एक बार पुनः बाबा साहेब आंबेडकर को रोकने का षड्यंत्र रचा गया कि जिस क्षेत्र से बाबा साहेब आंबेडकर विजयी हुए थे। उस क्षेत्र को भारत पाक बंटवारे में पाकिस्तान को दे दिया गया, जबकि शर्तों के अनुसार वही क्षेत्र पाकिस्तान को दिया जाना था, जहाँ 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी मुस्लिम समाज की थी। जबकि बाबा साहेब आंबेडकर के क्षेत्र जस्सोर खुलना की आबादी मात्र 30 प्रतिशत मुस्लिम समाज की होने पर भी उसे पाकिस्तान को दे दिया गया।
ऐसा होने पर बाबा साहेब आंबेडकर की संविधान सभा की सदस्यता भारत में स्वतः ही निरस्त हो गई।
ऐसा होने पर बाबा साहेब आंबेडकर को बहुत बुरा लगा। उन्होंने इस षड्यंत्र के बारे में उस वक्त की अंग्रेजी सरकार को अवगत कराया, तो अंग्रेजी सरकार ने ब्रिटेन से गाँधी व नेहरू को सन्देश भेजा कि यदि डॉ भीमराव आंबेडकर को संविधान सभा में नहीं भेजा गया तो भारत की आजादी के निर्धारित दिन 15 अगस्त को हम टाल भी सकते हैं। तब जाकर गांधी व नेहरू को खलबली मची एवं उन्होंने बॉम्बे से कांग्रेस के एक सदस्य एम आर जयकर का इस्तीफा दिलाकर बाबा साहेब अंबेडकर को न चाहते हुए भी वहाँ से जीताकर संविधान सभा में भेजना पड़ा।

बाबा साहेब आंबेडकर ने अपनी खराब सेहत की परवाह किए बिना 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन की अथक मेहनत से दुनिया का सबसे बड़ा लिखित व बेहतरीन संविधान बनाकर 26 नवम्बर 1949 को संविधान निर्माण समिति को सौंपा, जो बाद में 26 जनवरी 1950 को भारत के संविधान के रूप में अंगीकार किया गया।

संविधान अंगीकार करने के बाद आज तक मनुवादी सरकारों ने इसे ठीक से कभी लागू ही नहीं किया एवं घोर मनुवादी आर एस एस विचारधारा की सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री ने तो संविधान रिव्यू कमेटी भी गठित कर दी थी। और आज की वर्तमान सरकार के भी कुछ केंद्रीय मंत्री मंच से घोषणा कर चुके हैं कि हम सरकार में संविधान बदलने के लिए ही आये हैं।

भारत के संविधान को ठीक से लागू नहीं करने व इसे बदलने की मंशा रखने के पीछे मुख्य कारण यह है कि बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा लिखित संविधान समता व स्वतंत्रता ,और बन्धुत्वता की बात करता है।
लेकिन वहीं मनुवादी धर्म शास्त्र असमानता एवं गुलामी की बात करते हैं तभी तो मनुवादी धर्म के महत्वपूर्ण ग्रन्थ मनुस्मृति को बाबा साहेब आंबेडकर ने स्वयं जलाया था। लेकिन आज उस मनुस्मृति को पुनः लागू करने की इच्छा रखने वाले लोग बाबा साहेब आंबेडकर के संविधान को जलाने एवं उनकी मूर्तियों को तोड़ने का कुकृत्य करने में लगे हुए हैं, साथ ही धर्म निरपेक्ष राष्ट्र को धर्म विशिष्ट राष्ट्र बनाने की बात करते हैं व असमानता पर आधारित मनुस्मृति लिखने वाले मनु की मूर्ति हाई कोर्ट परिसर जयपुर में स्थापित करके खतरनाक सन्देश दे रहे हैं।

अब समझ में आ जाना चाहिए कि 26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर भारत के संविधान की चर्चा कर व संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर को याद क्यों नहीं किया जाता है..??
🙏जय भीम जय भारत 🙏
🙏 जय संविधान🙏
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@ किशोरीकांत चौधरी 
अध्यक्ष 
ऑल इंडिया Sc, St ,Obc
एम्प्लाइज को-ऑर्डिनेशन कौंसिल ,वेकोलि- माजरी क्षेत्र

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