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अपट्रान के बंद होने के बाद आर्थिक तंगी से जूझ रहे कर्मचारी, 21 वर्षो से नही हुआ भुगतान


अपट्रान के हर प्रोडक्ट धड़ल्ले से बिकने के बावजूद, क्यों पड़ा अपट्रान पर ताला ?

-आर्थिक तंगी से परेशान लगभग 380 कर्मचारियों ने दम तोड़ा तो किसी ने की खुदकुशी–

-आखिर कब मिलेगा अपट्रान के कर्मचारियों का वेतन व पीएफ, कब रुकेगा भुखमरी के कारण जिन्दगी से हारकर मौत को गले लगाने का सिलसिला ?

लखनऊ, 07 सितंबर 2021, कभी जिंदादिली से जिंदगी जीने वाले, तो कभी अपने सपनो को साकार करने की चाह रखने वाले, कभी अपने घर की किसी भी जरूरत को बिना सोचे पूरा करने वाले, तो कभी परिवार की हर ख्वाहिश पर जान लुटाने वाले अपट्रान कर्मचारी वर्तमान में आर्थिक तंगी से जूझ रहें हैं, सैकड़ों कर्मचारी आज भुखमरी की कगार पर है, सन 1985 में अपट्रान की गिनती भारत की पांच बड़ी कम्पनियों में से एक के रूप में होती थी, जिसका उत्पाद विदेशो में भी विक्रय हो रहा था, किसी ने भी नही सोचा था कि अपट्रान इंडिया लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनी में नौकरी करने के बाद लोगों को आज इतनी बुरी दशा का सामना करना पड़ेगा, जिंदगी से हारकर मौत को गले लगाना पड़ेगा, जी हां पिछले 21 वर्षो से अपट्रान के कर्मचारियों का ऐसा हाल इसलिए है कि अपट्रान इंडिया लिमिटेड पर ताला लग गया, अपट्रॉन इंडिया लिमिटेड उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रानिक्स कारपोरेशन की एक इकाई थी और इसका स्वामित्व राज्य सरकार के पास था और तब अपट्रान में करीब 22 सौ कर्मचारी कार्यरत थे, जिस तेजी के साथ लोगों की जुबान पर अपट्रान का नाम था उसी तरह से उनकी बंदी भी दर्द भरी रही थी, वर्ष 1990 के बाद अपट्रान इंडिया लिमिटेड की आर्थिक स्थिति खराब होती गई, प्रदेश सरकार, यूपी इलेक्ट्रानिक्स कारपोरेशन और अपट्रान प्रबंधन ने 1994 में अपट्रान को बीमार घोषित कर दिया, कंपनी को बोर्ड ऑफ इंडस्ट्रियल एंड फाइनेशियल रिकंस्ट्रक्शन (बीआईएफआर) को भेज दिया था, हालाकि अपट्रान की बंदी से देश की आंतरिक सुरक्षा संचार प्रणाली को गहरा झटका लगा था, कंपनी के पास कार्यशील पूंजी और कर्मचारियों को भुगतान करने का वर्ष 1997 में आर्थिक संकट आ गया था, तब तत्कालीन केंद्र सरकार ने कार्यशील पूंजी के लिए कंपनी को पांच करोड़ रुपये मदद को दिए थे लेकिन समय के साथ कर्मचारियों के सामने वेतन का संकट छा गया था, वर्ष 1997 नवंबर माह से कर्मचारियों के बकाया वेतन को देने के लिए वर्ष 1998 में दो करोड़ रुपए और 6.98 रुपए की रकम अपट्रान कंपनी को दी गई थी, इस रकम से कर्मचारियों को नवंबर 1997 से मई 1998 तक का एक मुश्त वेतन व पीएफ का भुगतान किया गया था, लेकिन अपट्रान प्रबंधन ने कर्मचारियों को जून 1998 से वेतन व पीएफ देना बंद कर दिया था जिसका भुगतान कर्मचारियों को आजतक नहीं किया गया, जिस कारण नाराज कर्मचारी सड़क पर उतर आए, और अशोक मार्ग स्थित अपट्रान मुख्यालय के सामने प्रदर्शन करने लगे थे, उसी बीच उत्तर प्रदेश के इलेक्ट्रॉनिक व सूचना मंत्री ने कर्मचारियों के बकाया वेतन व पीएफ को शीघ दिलाने का आश्वासन दिया था।

आर्थिक तंगी से परेशान अपने बच्चो समेत सड़को पर भीख मांगने पर मजबूर..

वही दूसरी तरफ सरकार की चुप्पी से आहत आर्थिक तंगी से परेशान अपट्रान कर्मचारियो ने अपने बच्चो समेत सड़को पर भ्रमण कर जनता से भीख मांगने पर मजबूर हुए, केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार के नाम पर राहगीरों से भीख मांगी, इसी के चलते वर्ष 2000 में कर्मचारियों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वीकृत स्वैच्छिक सेवानिवृत्त योजना (VRS) लागू की, आर्थिक रूप से परेशान लगभग 1350 कर्मचारियों ने विभिन्न चरणों में स्वैच्छिक सेवानिवृत्त योजना का लाभ लिया क्योंकि इस योजना के अनुसार कर्मचारियों का जून 1998 से बकाया वेतन व पीएफ का भुगतान भी मिलना था जो आज तक नहीं मिला “इस योजना के अंतर्गत लाभान्वित किए जाने वाले कर्मचारियों व अधिकारियों को उनके देय बकाया वेतन आदि का भुगतान शासन से इस मद में कंपनी को धनराशि उपलब्ध होने पर को 31-03-2001 या उससे पूर्व हो सकती है किया जाएगा जिसका आगणन निर्धारित तिथि हेतु किया जाएगा” लेकिन स्वैच्छिक सेवानिवृत्त योजना का लाभ लेने वाले अपट्रान कर्मचारियों को उनके बकाया वेतन व पीएफ का भुगतान आज तक नहीं हुआ, जिस कारण कर्मचारियों को पेंशन का भी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

आर्थिक तंगी से परेशान लगभग 380 कर्मचारियों ने दम तोड़ा तो किसी ने की खुदकुशी..

विगत वर्षो में अपट्रान के कर्मचारियों का वेतन न मिलने के कारण उनके घरों में चूल्हे नही जले, आर्थिक तंगी से जूझता उनके परिवार का सब्र टूटने लगा जिस कारण लगभग 380 लोगों की जान चली गई, और वर्षो से इलाज न करा पाने के कारण बीमारी की हालत मे बिस्तरों पर पड़े हैं, और कुछ आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या करने को मजबूर, उत्तर प्रदेश लखनऊ के आनंद नगर आलमबाग निवासी 56 वर्षीय अपट्रान के पूर्व कर्मचारी अशोक सचदेवा ने हताश होकर फांसी लगा ली।

अपट्रान के हर प्रोडक्ट धड़ल्ले से बिकने के बावजूद, क्यों पड़ा अपट्रान पर ताला..

एक बात समझ से परे है कि जिस कंपनी के प्रोडक्ट देश व विदेशो के बाजार में खूब धड़ल्ले से बिक रहे हो तथा अपट्रान के प्रोडक्ट की बाजार में भरमार हो, तो ऐसे में कंपनी बीमार कैसे हो सकती है? ऐसे में अपट्रान पर ताला कैसे पड़ सकता है? कंपनी बीमार तभी हो सकती है जब मार्केट में सप्लाई बंद हो जाए और उस कंपनी के प्रोडक्ट बिकने में कमी और गिरावट आ जाए, अब ऐसे में देश विदेश के लोग अगर अपट्रान के प्रोडक्ट को ना पसंद करने लगे हो तो ऐसे में कंपनी को बीमार घोषित कर दिया जाएगा, लेकिन अपट्रान कंपनी के साथ तो ऐसा कुछ भी नही हुआ था बल्कि अपट्रान कंपनी के हर प्रोडक्ट धड़ल्ले से बिक रहें थे, तो फिर अपट्रान को बीमार घोषित क्यों किया गया और कंपनी पर ताला क्यों पड़ा?

अपट्रान की तबाही में अफसरों का हाथ..

अपट्रान के विभिन्न इकाइयों को घाटे में लाने और इन्हें बंदी तक पहुंचाने में चंद नौकरशाहों का भी हाथ रहा है, समय-समय पर अपट्रान की ऊंची कुर्सी पर तैनात हुए इन नौकरशाहों ने अपने सुख सुविधाओं में किसी प्रकार की कटौती नहीं की और इसका व्यवसाय बढ़ाने के बजाय शासन में बैठे अधिकारियों को भ्रामक सूचनाएं देकर अपनी कुर्सी बचाते रहे, ये चंद अफसर वही हैं जिन्हें अपट्रान इंडिया लिमिटेड चलाने के लिए चेयरमैन या फिर प्रबंध निदेशक जैसी महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठाया गया।

-अब सवाल ये उठता है कि अपट्रान के अधिकारी एवं कर्मचारियों को आखिर कब मिलेगा वेतन व पीएफ, कैसे दूर होगी उन सभी की आर्थिक तंगी, आखिर कब रुकेगा भुखमरी के कारण जिन्दगी से हारकर मौत को गले लगाने का ये सिलसिला?

रिपोर्ट @ आफाक अहमद मंसूरी

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